राजभाषा सप्ताह का शुभारंभ

 

वाराणसी। केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान, सारनाथ के राजभाषा कार्यान्वयन समिति द्वारा राज भाषा सप्ताह सप्ताह का शुभारंभ हुआ । कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में विशिष्ट वक्ता के रूप में आकाशवाणी एवं दूरदर्शन वाराणसी के कार्यक्रम प्रभारी राजेश गौतम ने कहा कि जिस देश में 80 प्रतिशत से भी ऊपर लोग हिंदी भाषा को व्यवहार में जीते हैं,वह भाषा संकट में हो ही नहीं सकती। वर्तमान में भारत सरकार पूर्ण रूप से राजभाषा के विकास में लगी है। चुनौतियां हर जगह हैं, उससे हम भाग नहीं सकते परंतु चुनौतियां हमें आगे बढ़ने का अवसर देती हैं। उन्होंने बताया कि भाषा को बढ़ाने में रेडियो, फिल्म, नाटक, साहित्य सबकी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में प्रोफेसर राम सुधार सिंह ने कहा कि वर्तमान के आंकड़े यह दिखाते हैं की हिंदी अब प्रथम स्थान पर आ पहुंची है। हिंदी आम जन की भाषा है,लोक की भाषा है इसलिए इसे किसी के सहारे की जरूरत नहीं है। दूसरी भाषा के शब्दों को भी अपने में ढाल कर पचाने की क्षमता सिर्फ हिंदी के पास है।उन्होंने कहा की भाषा मां के दूध के साथ आती है।यह जो भाव भाषा में मिला है उसे कैसे बुलाया जा सकता है ।इसकी व्यापकता के लिए एक भाव भूमि की जरूरत है। दुख से पीड़ित व्यक्ति की भाषा उसकी मातृभाषा ही होगी। उन्होंने कहा कि सभी भारतीय भाषाओं का सांस्कृतिक इतिहास है ।उन सभी भाषाओं का संरक्षण जरूरी है लेकिन हिंदी को सभी भाषाओं में प्रमुख बनाने की जरूरत है ।अज्ञेय कहते हैं कि “जब हम पराधीन थे तो हमारे लिखने की भाषा स्वाधीन थी और आज जब हम स्वाधीन हैं तो हमारी भाषा पराधीन हो गई है।यह देश का दुर्भाग्य है।”जब तक हिंदी का विस्तार विज्ञान और तकनीकी तक नहीं होगा, जब तक हमारा स्वाभिमान जागृत नहीं होगा तब तक हम हिंदी का राग अलापते रहेंगे।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के शिक्षा संकाय के पूर्व प्रमुख प्रोफेसर हरिकेश सिंह (पूर्व कुलपति,जे.पी.विश्वविद्यालय) ने कहा कि दुनिया आज एक वैश्विक गांव हो गई है। भाषा भाव है वह जीवन की अनुभूति है। व्यक्ति जैसे -जैसे अपनी अनुभूति में विस्तार पाएगा वैसे-वैसे भाषा का विस्तार होगा। खाद्य और वाद्य जहां-जहां जाएगा वहां-वहां भाषा का विकास होगा । भजन ,कीर्तन और भोजन से ही भाषा का निर्माण होता है ।कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए संस्थान परिवार के कुलपति प्रो. डब्ल्यू डी नेगी ने कहा कि राष्ट्रगान, राष्ट्र ध्वज ,राष्ट्रभाषा किसी भी देश की एक होनी चाहिए। इस देश का दुर्भाग्य है कि राजनीतिक स्वार्थ के कारण यह संभव नहीं हो पाया है जिसके कारण राजभाषा की समस्या आज तक बनी हुई है। भाषा एक भाव है एक सोच है एक विचार है एक जीवन है । इसीलिए भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कहा था कि “निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल। बिनु निज भाषा ज्ञान के मिटत न हिय को शूल।” उन्होंने कहा कि भाषा जब तक हमारे हृदय को छुएंगी नहीं, भाषा जब तक हमारे हृदय में समाहित नहीं होगी, भाषा तब तक वह जन- जन की भाषा नहीं होगी तब तक एक चुनौती बनी हुई है।इसके लिए सरकार को कर्मचारियों को अधिकारियों को तथा पूरे देशवासियों को मिलकर, एक होकर इस भाषा को आगे बढ़ाने में भूमिका देनी होगी तभी जाकर हिंदी राष्ट्रभाषा बन पायेगी। संचालन डॉ अनुराग त्रिपाठी,स्वागत संस्थान के कुल सचिव डॉ सुनीता चंद्रा ने किया। दीपांकर धन्यवाद ज्ञापन किया।इस अवसर पर प्रो रामजी सिंह, डॉ शुचिता शर्मा, रवि रंजन द्विवेदी,डॉ सुशील कुमार सिंह श्री राजेश कुमार मिश्र आदि थे।

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