ग्रंथों की शिक्षाएं आज भी प्रासंगिक हैं

अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केन्द्र में कार्यशाला का चौथा दिन 

 

वाराणसी ।अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केन्द्र (आईयूसीटीई), वाराणसी द्वारा *“भारतीय ज्ञान परम्परा”* विषय पर छः दिवसीय ऑनलाइन संकाय विकास कार्यक्रम प्रो. प्रेम नारायण सिंह, निदेशक, आईयूसीटीई, वाराणसी तथा प्रो. आशीष श्रीवास्तव, डीन (शैक्षणिक एवं अनुसंधान), आईयूसीटीई, वाराणसी के निर्देशन में आयोजित किया जा रहा है।

 

चौथे दिन के प्रथम सत्र के वक्ता प्रो. प्रेम नारायण सिंह, निदेशक, आईयूसीटीई, वाराणसी ने “पेडागॉजिकल रिफॉर्म्स थ्रू आईकेएस” विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए । उन्होंने बताया कि भारतीय ज्ञान प्रणाली (आई.के.एस.) शिक्षा में नवाचार का नया मार्ग प्रशस्त कर रही है। पेडागॉजिकल सुधारों के माध्यम से शिक्षण पद्धतियों को अधिक व्यावहारिक और मूल्य आधारित बनाया जा रहा है। वैदिक गणित, आयुर्वेद और खगोल विज्ञान जैसे विषय आधुनिक शिक्षा से जोड़े जा रहे हैं। यह पहल विद्यार्थियों को सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ते हुए वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करती है। आईकेएस आधारित सुधार शिक्षा को समग्र विकास और नैतिक मूल्यों की दिशा में आगे बढ़ा रहे हैं।

 

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में प्रो. प्रेम नारायण सिंह, निदेशक, आईयूसीटीई, वाराणसी ने “लॉ, सोसाइटी एंड पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन (स्मृतियाँ, नीति लिटरेचर, आदि)” विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए । उन्होंने बताया कि कानून, समाज और लोक प्रशासन के क्षेत्र में भारतीय परंपराओं का गहरा प्रभाव देखा जा सकता है। स्मृतियाँ और नीति साहित्य प्रशासनिक ढाँचे को नैतिकता और न्याय के आधार पर दिशा प्रदान करते हैं। समाज की संरचना और शासन व्यवस्था में इन ग्रंथों की शिक्षाएँ आज भी प्रासंगिक हैं। लोक प्रशासन में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को बढ़ाने के लिए भारतीय ज्ञान प्रणाली का योगदान महत्वपूर्ण है। यह पहल आधुनिक प्रशासनिक सुधारों को सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ते हुए समग्र विकास की ओर अग्रसर करती है।

 

कार्यक्रम के तृतीय सत्र में डॉ. सुध्युम्न आचार्य, न्यासी, राम लाल कपूर ट्रस्ट, सतना ने “संस्कृत, लैंग्वेज साइंस एंड नॉलेज ट्रांसमिशन (पाणिनि, निरुक्त, महाभाष्य, आदि) ” विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए । उन्होंने बताया कि संस्कृत भाषा भारतीय ज्ञान परंपरा की आधारशिला रही है। पाणिनि का व्याकरण, निरुक्त की व्याख्या और महाभाष्य की गहनता भाषा विज्ञान को अद्वितीय स्वरूप प्रदान करती है। इन ग्रंथों के माध्यम से ज्ञान का संप्रेषण पीढ़ी दर पीढ़ी होता रहा है। संस्कृत की संरचना और वैज्ञानिकता आधुनिक भाषाविज्ञान के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है। यह परंपरा आज भी शिक्षा, अनुसंधान और सांस्कृतिक संवाद में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। दिन के अंतिम सत्र में प्रतिभागियों ने प्रेजेंटेशन तथा चर्चा किया।

 

इस छः दिवसीय कार्यक्रम में 100 से अधिक प्रतिभागी प्रतिभाग कर रहे हैं। कार्यक्रम का संयोजन डॉ. सुनील कुमार त्रिपाठी तथा डॉ. राजा पाठक, सहायक प्राध्यापक, आईयूसीटीई द्वारा किया जा रहा है।

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