प्रयागराज।उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थानम् लखनऊ के तत्वावधान में तथा जगद्गुरु रामानुजाचार्य प्रयाग पीठाधीश्वर स्वामी श्रीधराचार्य जी महाराज के पावन सान्निध्य में “संस्कृत भाषा एवं साहित्य का अन्य भाषाओं पर प्रभाव “विषयक विद्वत्गोष्ठी वैकुण्ठ धाम आश्रम अलोपीबाग प्रयागराज के सभागार में सम्पन्न हुई।

विषय प्रवर्तन करते हुए डा सन्तोष कुमार मिश्र ने कहा कि संस्कृत भाषा और साहित्य का विश्व के तमाम भाषा और साहित्य पर असर है। पूर्व प्राचार्य डा शम्भूनाथ त्रिपाठी अंशुल ने कहा कि संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है इसलिए इसका प्रभाव विश्व के सभी भाषा और साहित्य पर है। प्रोफेसर विनोद कुमार गुप्त ने तमाम शब्दावलियों का उध्दरण देते हुए सिध्द किया कि भाषा शास्त्रियों के अनुसार संस्कृत भाषा और साहित्य का प्रभाव विश्व के सभी भाषाओं और साहित्य पर पर्याप्त रुप से पड़ा है।प्रो विद्याशंकर त्रिपाठी ने कहा कि संस्कृत साहित्य अगाध है। विश्व में सभी भाषाओं के साहित्य इससे प्रभावित हैं। अध्यक्षीय उद्बोधन में डाक्टर रामजी मिश्र ने कहा वेद विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थ हैं। लौकिक संस्कृत साहित्य वाल्मीकि जी से प्रादुर्भूत है, वे आदि कवि हैं। भारत की सभी भाषाएँ संस्कृत की अपरूप हैं इसलिए संस्कृत भाषा और साहित्य का दूसरी भाषाओं और साहित्य पर पर्याप्त असर है।

अपने आशीर्वचन में जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी श्रीधराचार्य जी महाराज ने कहा कि वेद व्यास पहले ही लिख चुके हैं कि जो यहाँ है वही सब जगह है, जो यहाँ नहीं है वह कहीं नहीं है। विद्वत गोष्ठी में डा वीरेन्द्र कुमार तिवारी, विनय श्रीवास्तव,दुकान जी, सहित शहर के गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

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