
वाराणसी।संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, विद्याश्री न्यास, राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ उ.प्र व लाल बहादुर शास्त्री स्नातकोत्तर महाविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में योगसाधना केन्द्र में आयोजित राष्ट्रीय शैक्षिक संगोष्ठी के दूसरे दिन तृतीय सत्र में डा. नीलम ने कहा कि गत नीतियों के विपरीत, एन ई पी 2020 छात्रों को अपनी भाषाओं का चयन करने में अधिक लचीली रखी गई है। जिससे विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों की भाषाई विविधता को समायोजित की जा सकती है।
डा आशुतोष ने कहा कि इस नीति का उद्देश्य छात्रों की सांस्कृतिक पहचान और सांस्कृतिक गौरव को बनाए रखना है, साथ ही यह भी सुनिश्चित करना है कि वे विभिन्न भारतीय भाषाओं और संस्कृतियों को समझें और उनका सम्मान करें।
डा कामेश सिंह ने कहा कि अपनी मातृभाषा को प्राथमिकता देते हुए वैश्विक तत्परता हेतु दूसरी भाषाओं को सीखाने से छात्रों को वैश्विक स्तर पर भी प्रतिस्पर्धी बनाया जा सकता है, जिससे वे बहुभाषी और सांस्कृतिक रूप से जागरूक नागरिक बने।
डा प्रियंवदा ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति की चुनौतियों व समाधान पर बोलते हुए कहा कि राज्यों के बीच सर्वसम्मति का अभाव, अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा (विशेषकर डिजिटल शिक्षा के लिए), योग्य शिक्षकों की कमी, फंडिंग की समस्या, विभिन्न भाषाओं में सामग्री के अनुवाद की कठिनाई, और अति- केंद्रीकरण व संस्थागत प्रतिरोध आदि प्रमुख हैं।
राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन समारोह में प्रो संजय ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में शिक्षा की पहुँच, समता, गुणवत्ता, वहनीयता और उत्तरदायित्व जैसे मुद्दों पर विशेष ध्यान दिया गया है।है। नई शिक्षा नीति के तहत केंद्र व राज्य सरकार के सहयोग से शिक्षा क्षेत्र पर देश की जीडीपी के 6% हिस्से के बराबर निवेश का लक्ष्य रखा गया है अगर ऐसा किया जायेगा तो विश्वविद्यालय व महाविद्यालयों की आधारभूत संरचना मज़बूत होगी ।
प्रो भावना ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इस बात पर बल दिया गया है कि विद्यार्थियों को मातृभाषा में शिक्षा दी जाए जिसके फलस्वरूप उनकी संज्ञानात्मक कुशलता जैसे समस्या-समाधान, रचनात्मकता और आलोचनात्मक सोच सकारात्मक रूप से विकसित होगी।
डा विशाखा ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 नीति भारत की भाषाओं को बढ़ावा देने पर केंद्रित है, जो छात्रों को सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने में सहायता प्रदान करती है जिससे उनका बौद्धिक विकास होता हैं। ये नीति भारत की भाषाई विविधता का सम्मान करती है और बहुभाषावाद को एक महत्वपूर्ण कौशल के रूप में देखती है, जिससे विद्यार्थियों में राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक समझ विकसित होगी और @ 2047 तक विकसित भारत के सपने को साकार करने में सहायता करेगी।
श्री व्रजेश ने कहा कि त्रिभाषा से बच्चों को बहुत सी भाषाओं को सीखने का अवसर मिलेगा । बहुभाषावाद से अंतर्राष्ट्रीय सद्भाव को बढ़ावा मिलेगा ।राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का मुख्य लक्ष्य है बच्चों के संज्ञानात्मक विकास में भाषाएँ सीखना भी शामिल है, जो महत्वपूर्ण है। बहुभाषावाद और अंतर्राष्ट्रीय सद्भाव को बढ़ावा देना इसका मुख्य लक्ष्य है। इसके द्वारा भाषाई अंतर को पाटा जा सकेगा और देश भर में प्रभावी संचार की व्यवस्था संभव हो पाएगी।
प्रो राजीव ने कहा कि क्षेत्रीय भाषाओं के प्रयोग और सीखने को बढ़ावा देने से उन्हें भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षित करने में मदद मिल सकती है।
डा दीपक ने कहा कि अनेक भाषाएँ सीखने से संज्ञानात्मक विकास होता है व चिंतन की प्रक्रिया सुदृढ़ होती है ।
समापन सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रो उदयन ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति को सफलतापूर्वक लागू करने के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की आवश्यकता होगी।यह नीति विद्यार्थियों को अपनी जड़ों से जुड़ने में मदद करेगी जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा और वे वैश्विक स्तर की चुनौतियों हेतु तैयार हो पाएंगे। समापन सत्र में अतिथियों का स्वागत प्रो अरुण ने संचालन डा दीपक ने व आभार श्री धर्मेंद्र ने किया।
कार्यक्रम के अंत में दो दिवसीय संगोष्ठी का प्रतिवेदन डा अरविंद कुमार ने प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम में प्रमुख रूप से प्रो अमित राय, प्रो धनंजय, डा जे पी शर्मा, डा विशाल, डा साधना, डा विजय लक्ष्मी, डा मीना, डा सारिका, डा वंदना, डा मनोज वर्मा, श्री विनोद, श्री हर्षवर्धन,डा कृष्ण कुमार, डा मनु मिश्र , डा सुजीत, डा अजय, श्री संजय,डा संजय प्रताप,डा हर्ष, डा मेहबूब, डा संतोष आदि के साथ छात्र/ छात्राएँ उपस्थित रहे।
