
वाराणसी।संस्कृत विद्या विभाग में शास्त्र के अध्ययन में नवाचार विषयक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। उक्त संगोष्ठी में इटली की डॉक्टर एन्तोलेना व्याकरण के विविध सूत्रों एवं उदाहरण को आधुनिक दृष्टि से पठन-पाठन की आवश्यकता एवं संबंधित प्रविधियों पर विशेष प्रकाश डाला। डॉक्टर एन्तोलेना पाणिनि के वैज्ञानिक उच्चारण स्थान का व्यवहारिक के रूप से उच्चारण के माध्यम से परिचय कराया। साथ ही बताया कि अन्य भाषाओं में वर्णों के उच्चारण से संबंधित प्रक्रियाओं पर विचार नहीं के बराबर है। प्रोफेसर हीरक कांति चक्रवर्ती ने संस्कृत शास्त्रों के प्रचार प्रसार हेतु आधुनिक पद्धति से अध्यापन कराने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि शास्त्र में निहित ज्ञान और विज्ञान आज भी संधि और समासों के नियमों से आबद्ध होने के कारण अतिजटिल है। शास्त्र में निहित नियमों का संरक्षण करते हुए अध्ययन अध्यापन कराने की आवश्यकता है किंतु यह भी ध्यान हो कि इसमें सुगमता कैसे आ सकती है।
प्रोफेसर शैलेश कुमार मिश्र ने इस संगोष्ठी में नई शिक्षा नीति के क्रम में प्राचीन शास्त्रों का अध्ययन अध्यापन हेतु टीकाआओं की अपेक्षा पहले मूल ग्रन्थ का पठान पाटन आवश्यक है। यह भी ध्यान रहे की व्याकरण पढ़ते समय सूत्रों को पढाने की अपेक्षा सरलभाषा में उनके आशय को पहले पढ़ाया जाए।
डॉ रविशंकर पांडेय ने व्याकरण के सूत्रों तथा उनके लक्षण पर विशेष प्रकाश डालते हुए बताया कि छात्रों की बौद्धिक क्षमता का आकलन करते हुए पारिभाषिक शब्द मुक्त सहज शब्दों में सूत्रों के अध्ययन अध्यापन की आवश्यकता है। साथ ही आजकल का पाठ्यक्रम सेमेस्टर वार विभाजित होने के कारण पाठ्यक्रमों को व्यवस्थित रूप से पढाने की प्रक्रिया में परिवर्तन की आवश्यकता है।
संगोष्ठी का संचालन विभाग के अतिथि अध्यापक डॉक्टर बालेश्वरझा ने किया। धन्यवाद ज्ञापन विभागीय छात्र शिवम मौर्य ने किया। इस अवसर पर अनेक छात्रों ने अपना विचार अभिव्यक्त किया।
